भूमिका

सनातन धर्म ही इस विश्व की सबसे प्राचीन, सर्वाधिक व्यापक एवं सर्वोत्तम धार्मिक परम्परा है - जो अनादि, अपौरुषेय एवं वेदमूलक होने के कारण नित्य, अविनाशी एवं सार्वभौमिक है। वेद उसके प्राण-स्वरूप हैं, स्मृतियाँ उसकी व्यवस्थापिका हैं, पुराण एवं इतिहास उसके प्रकाश-स्तम्भ हैं, दर्शनशास्त्र उसके तर्क-प्रतिष्ठापक हैं। ये सभी मिलकर सनातन वैदिक धर्म के उस विराट्, अखण्ड एवं शास्त्र-प्रतिष्ठित स्तम्भ का निर्माण करते हैं, जो युगों-युगों से मानवता को धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष का साक्षात् मार्ग प्रदर्शित करता आ रहा है।

परन्तु अत्यन्त खेद का विषय है कि आधुनिक काल में कुछ ऐसे पन्थ उत्पन्न हुए हैं, जो स्वयं को प्राचीन अथवा वैदिक कहकर भी वेद-विरुद्ध, शास्त्र-विरुद्ध एवं परम्परा-विरुद्ध बातों का प्रचार कर रहे हैं, और भोली-भाली जनता को सनातन धर्म के मूल सिद्धान्तों से विमुख करने का सतत् प्रयास कर रहे हैं। अनेक हिन्दू, विशेषकर युवा वर्ग, अपने शास्त्रों से अपरिचित होने के कारण, तथा प्रामाणिक धर्माचार्यों के सान्निध्य में न रहने के कारण, इनके भ्रम-जाल में सहज ही फँस जाते हैं।

ऐसे ही पन्थों में आर्यसमाज प्रमुख है, जिसके प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने, प्रोफ़ेसर हरमैन रुडोल्फ, जॉन मुइर, मैडम हेलेना पेत्रोव्ना ब्लावात्स्की और हेनरी स्टील ओलकॉट जैसे विधर्मियों के कुतर्को से प्रभावित होकर, लिखे हुये सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से - अवतारवाद, मूर्तिपूजा, श्राद्धकर्म, देवतोपासना, बहुदेववाद आदि - लगभग सभी प्राचीन वैदिक मान्यताओं - का सुनिश्चित खण्डन किया, और उनके अनुयायी भी आज तक वही कार्य करते देखे जाते हैं।

हमारे पूज्य पूर्वाचार्यों ने अपने-अपने समय में आर्यसमाज के विद्वानों के साथ अनेक शास्त्रार्थों में उन्हें पराजित किया, तथा अनेक ग्रन्थों की रचना करके जनता के समक्ष उनके सिद्धान्तों को ध्वस्त करते हुए स्पष्ट कर दिया कि स्वामी दयानन्द के सिद्धान्त पूर्णतः अवैदिक हैं।

किन्तु पन्थान्ध अनुयायियों में यह स्वाभाविक दोष होता है कि वे अपने मत का समूल खण्डन हो जाने पर भी उसे नहीं त्यागते, बल्कि एक मिशनरी के समान निरन्तर अपने असत्य के प्रचार में जुटे ही रहते हैं। यही बात यहाँ भी हुई - भारत में ये लोग सभी विषयों पर अपना झूठ प्रचारित करते रहे, नए नए झूठ गढ़ते रहे। हिन्दुओं के मन में उनके धर्म के प्रति, उनके शास्त्रों के प्रति, उनके धर्माचार्यों के प्रति घृणा का भाव भरकर, उन्हें अपने पन्थ में लाना ही इनका एकमात्र उद्देश्य रहा है - और इसी कार्य में ये जी-जान से जुटे रहते हैं।

कई वर्ष पूर्व जब मैंने आर्यसमाज के इस दुष्प्रचार को देखा, तब मन में इनके अवैदिक सिद्धान्तों के खण्डन का विचार उत्पन्न हुआ। इसके लिए मैंने स्वामी दयानन्द का सम्पूर्ण साहित्य, उनकी सभी जीवनियाँ, सभी पत्र, तथा आर्यसमाज द्वारा प्रकाशित अनेक पुस्तकें आदि का भली-भाँति अध्ययन किया - क्योंकि खण्डन से पूर्व विपक्ष के मूल, शाखा, आधार-सिद्धान्त आदि को जानना अत्यावश्यक होता है।

तत्पश्चात् विचार आया कि हमारे पूर्वाचार्यों को भी पढ़ा जाए, जिन्होंने जो खण्डन किया है, उससे भी सहायता प्राप्त हो सके। तब हमने पण्डित माधवाचार्य शास्त्री, पं० ज्वालाप्रसाद, पं० भीमसेन, पं० कालूराम शास्त्री, पण्डित दीनानाथ शर्मा, तथा धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज के साहित्य का अध्ययन किया - तो बड़ा आश्चर्य हुआ।

इन सभी विद्वान आचार्यों को पढ़ने के बाद आर्यसमाज के सिद्धान्तों के खण्डन के लिए अन्य कुछ लिखने का कोई अवकाश ही नहीं बचता। हमारा प्रथम प्रयास तो यही था कि इन पूज्य आचार्यों की ही पुस्तकों को प्रकाशित एवं प्रचारित किया जाए। किन्तु लक्ष्मी जी की कृपा के अभाव में वह सम्भव न हो सका। तब विचार किया - इन सभी पूज्य आचार्यों की पुस्तकों से विभिन्न विषयों पर सार-संग्रह करते हुए, प्रश्नोत्तर-क्रम में एक लघु-पुस्तिका प्रकाशित की जाए, जिससे सामान्य पाठक संक्षेप में ही अपने धर्म के सिद्धान्तों को समझ सके, और आर्यसमाज के असत्य से भी परिचित हो सके। इस विचारानुसार पूर्वाचार्यों के ही महान ग्रन्थ इस पुस्तक के आधार बने।

अतः यह कहना सर्वथा उचित है कि इस सम्पूर्ण पुस्तक के लेखक उक्त आचार्यगण ही माने जायें। उनके लिखे को दोहराते समय अपने भी कुछ शब्द जोड़ते हुए कोई भूल हुई हो, तो वह हमारी ही समझी जाए। एवं इस पुस्तक के विक्रय से जो धन प्राप्त होगा वह भी आचार्यो के साहित्य के प्रकाशन तथा अन्य पुस्तकों आदि में ही व्यय किया जाएगा।

इस पुस्तक-प्रकाशन का परम श्रेय जगद्गुरु स्वामी श्री निग्रहाचार्य जी महाराज को ही है, जिनकी प्रबल प्रेरणा, सूक्ष्मतम मार्गदर्शन एवं स्नेहिल आशीर्वाद ने इस कार्य को गति, दिशा एवं गरिमा प्रदान की। उनका यह सहयोग इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर स्पन्दित हो रहा है, और उनकी कृपा-छाया के बिना यह कार्य कदापि सम्भव न था।

आचार्य श्री गोपेश भारद्वाज जी तथा श्री नीरज तिवारी जी ने इसके प्रकाशन में आर्थिक एवं बौद्धिक सहयोग प्रदान किया, जिसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं।

इस पुस्तक के निर्माण एवं परिष्कार में अनेक पूज्य संतों, आचार्यों एवं विद्वानों का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। विशेषतः द्वारका पीठ के जगद् गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानन्द सरस्वती जी महाराज, जगद् गुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्री वासुदेवाचार्य विद्याभास्कर जी महाराज, जगद् गुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्री राघवाचार्य जी महाराज तथा पूज्य दण्डी स्वामी श्री ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज के आशीर्वाद, प्रेरणा एवं स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन ने इस कार्य को बल प्रदान किया। इन पूज्य महात्माओं के प्रति मैं अपनी कृतज्ञता एवं श्रद्धा निवेदित करता हूँ तथा उनके श्रीचरणों में सादर प्रणाम अर्पित करता हूँ।

अन्ततः इस पुस्तक को प्रस्तुत करने का प्रयोजन यही है कि -

सनातन वैदिक धर्म के स्वरूप को शास्त्रीय प्रमाणों के साथ सुस्थापित किया जाए,

आर्यसमाज द्वारा उठाए गए समस्त आक्षेपों का यथाशास्त्र, यथान्याय एवं यथाव्याकरण उत्तर दिया जाए,

तथा जनता को यथार्थ सत्य का बोध कराते हुए उनके मन में विद्यमान समस्त भ्रान्तियों का समूल नाश किया जाए।

शचीन्द्र शर्मा ९४५६६०५२४९ आषाढ़ शुक्ल षष्ठी, सोमवार, २०८३

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