श्री कृष्ण-सुदर्शनम्
श्रीकृष्णसुदर्शनम्
क्या आप भगवान् श्रीकृष्ण से प्रेम करते हैं? यदि आप आस्तिक हैं, तो इस प्रश्न का उत्तर निश्चित ही होगा, "हाँ।"
तब फिर प्रश्न होगा कि श्रीकृष्ण के विरुद्ध विभिन्न पंथों, मजहबों आदि द्वारा लगाए जाने वाले झूठे आक्षेपों के विरुद्ध आपने कभी कुछ किया? इसका उत्तर सोचिए।
पुनः सोचिए, अपने किसी ऐसे परिजन के विषय में, जिससे आप प्रेम करते हैं। यदि उन पर ऐसे आरोप लगाए जाएँ, तो क्या आप तब भी उदासीन बैठे रहेंगे?
क्या सचमुच आप भगवान् से प्रेम करते हैं, अथवा परलोक के भय अथवा किसी स्वार्थवश भक्ति करते हैं, जिसे आपका मस्तिष्क प्रेम समझता है? इसका उत्तर स्वयं ही स्वयं को दें।
वस्तुतः जिससे हमें वास्तविक प्रेम होता है, उसका तनिक भी अपमान हम सहन नहीं कर पाते। जिनसे हमें प्रेम होता है, उन पर लगाया गया कोई भी आक्षेप हमें विचलित कर देता है और हम उसके खण्डन हेतु प्रस्तुत हो जाते हैं।
वर्तमान समय में आर्यसमाज, ब्रह्मकुमारी, कबीरपंथ, नवबौद्ध, मुसलमान आदि विभिन्न पंथों एवं मजहबों द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति अनेक प्रकार के झूठे आरोप और आक्षेप लगाए जाते हैं।
आर्यसमाज, नवबौद्ध आदि तो खुले मंचों से श्रीकृष्ण को व्यभिचारी आदि कहा करते हैं। हाल ही में आर्यसमाज के एक प्रचारक स्वामी सच्चिदानन्द द्वारा सार्वजनिक मंच से ऐसे अभद्र एवं घृणित आरोप लगाए गए। यद्यपि वे इन सब आरोपों का आधार पुराणों को बताते हैं, किन्तु क्या वास्तव में पुराणों में श्रीकृष्ण को व्यभिचारी आदि कहा गया है? इसका उत्तर है, नहीं।
आर्यसमाज पुराणों के नाम पर श्रीकृष्ण को बदनाम करता है। उनकी देखा-देखी नवबौद्ध, मुसलमान आदि भी पुराणों के नाम पर श्रीकृष्ण की छवि को कलंकित करने का प्रयास करते हैं। कथित कबीरपंथी रामपाल भी श्रीकृष्ण के विरुद्ध अपनी पुस्तकों में लिखकर उन्हें निःशुल्क वितरित कर रहा है। लगभग सभी सम्प्रदाय अपने-अपने पंथ के अनुरूप श्रीकृष्ण की छवि को कलुषित करने में लगे हुए हैं।
प्रश्न है, हिन्दू इनके प्रतिउत्तर में क्या कर रहे हैं? एक हिन्दू होने के नाते, भगवान् श्रीकृष्ण के भक्त होने के नाते, क्या हमारा यह कर्तव्य नहीं है कि हम इस दुष्प्रचार का ठोस उत्तर दे सकें?
एवं उन असंख्य हिन्दू युवाओं के समक्ष सही समाधान प्रस्तुत कर सकें, जो इन पंथों के दुष्प्रचार के कारण अपने शास्त्रों एवं भगवान् के प्रति अपनी श्रद्धा को खण्डित कर बैठते हैं?
वर्तमान में हिन्दुओं की ओर से ऐसी कोई पुस्तक अथवा प्रचार-तन्त्र उपलब्ध नहीं है, जिसमें श्रीकृष्ण के प्रति लगाए जाने वाले इन सभी आक्षेपों का समाधान हो।
अतः हमारी आगामी पुस्तक "श्रीकृष्णसुदर्शनम्" में इन सभी पंथों द्वारा श्रीराधा एवं श्रीकृष्ण पर लगाए जाने वाले समस्त आक्षेपों का खण्डन शास्त्र एवं तर्क के आधार पर किया गया है। इसका अवलोकन करने के पश्चात् कोई भी संशय शेष नहीं रहेगा। यह पुस्तक निःशुल्क वितरित की जाएगी। विभिन्न स्थलों पर, इंटरनेट आदि के माध्यम से, इसका व्यापक प्रचार किया जाएगा। जो भी सहयोग करेंगे, उनके सहयोग के अनुरूप उन्हें इसकी प्रतियाँ प्रदान की जाएँगी, जिससे वे भी उन्हें उपहारस्वरूप आगे वितरित कर सकें।
निश्चित ही भगवान् को प्रसन्न करने तथा उनकी कृपा प्राप्त करने का यह एक अत्यन्त उत्तम उपाय होगा। सभी सहयोगकर्ताओं के नाम पुस्तक में लिखे जाएँगे।
यह ऐसी प्रथम पुस्तक होगी, जो श्रीकृष्ण के सुदर्शन की भाँति श्रीकृष्ण पर आरोप लगाने वाले इन शिशुपालों के कुतर्कों का मूलोच्छेद कर देगी, उनके मिथ्या प्रचार का समूल खण्डन करेगी तथा सत्य को प्रकट करेगी।
इस पुस्तक को पढ़कर आप न केवल श्रीराधा-कृष्ण की भगवत्ता, महिमा आदि को भलीभाँति समझ और जान पाएँगे, अपितु विरोधियों को उत्तर देने में भी समर्थ होंगे।
यहाँ हम आपको एक आरोप तथा उसका समाधान उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत करते हैं।
विवेक आर्य और स्वामी सच्चिदानन्द नामक आर्यसमाजी लिखते हैं कि, "कृष्ण भी अपनी किशोर अवस्था का मान करते हुए रात्रि के समय उनके (गोपियों) साथ रमण किया करते थे। कृष्ण उनके साथ किस प्रकार रमण करते थे, पुराणों के रचयिता ने श्रीकृष्ण को कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। भागवत पुराण, स्कन्ध १०, अध्याय २९, श्लोक ४५ और ४६ में लिखा है।
"कृष्ण ने यमुना के कपूर के समान चमकीले बालू के तट पर गोपियों के साथ प्रवेश किया। वह स्थान जलतरंगों से शीतल एवं कुमुदिनी की सुगन्ध से सुवासित था। वहाँ कृष्ण ने गोपियों के साथ रमण, बाहें फैलाना, आलिंगन करना, गोपियों के हाथ दबाना, उनकी चोटी पकड़ना, जाँघों पर हाथ फेरना, लहँगे का नाड़ा खींचना, स्तन पकड़ना, मज़ाक करना, नाखूनों से उनके अंगों को नोच-नोचकर घायल करना, विनोदपूर्ण चितवन से देखना और मुस्कराना तथा इन क्रियाओं के द्वारा नवयौवना गोपियों को खूब जागृत करके उनके साथ कृष्ण ने रात्रि में रमण (विषयभोग) किया।"
ऐसे अभद्र विचार श्रीकृष्ण महाराज को कलंकित करने के लिए भागवत के रचयिता ने स्कन्ध १० के अध्याय २९ और ३३ में वर्णित किए हैं।
शचीन्द्र (समाधान): विवेक आर्य एवं स्वामी सच्चिदानन्द ने दुर्भावना से इन श्लोकों का अनुचित तात्पर्य ग्रहण करके श्रीकृष्ण और भागवत को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
स्वयं को हिन्दुओं का हितैषी एवं हिन्दू धर्म का चौकीदार कहने वाले आर्यसमाज को करना तो यह चाहिए था कि इन श्लोकों का वास्तविक तात्पर्य प्रकट करते हुए अन्य विधर्मियों के आक्षेपों का उत्तर देता, किन्तु इन्होंने तो स्वयं ही अर्थ को तोड़-मरोड़कर, अपना नमक-मिर्च-मसाला लगाकर श्रीकृष्ण और पुराणों को बदनाम करना आरम्भ कर दिया। इससे आप समझ सकते हैं कि ये कितने बड़े कृष्णप्रेमी हैं। अब इनकी बात पर आते हैं।
इस श्लोक में प्रत्यक्ष संभोग का तो वर्णन नहीं है, किन्तु 'रमण' शब्द से स्वामी दयानन्द एवं आर्यसमाजी यहाँ विषयभोग का अर्थ ग्रहण करते हैं। अब चूँकि आर्यसमाजी श्रीकृष्ण को मनुष्य ही मानते हैं, अतः उसी दृष्टि से प्रथम विचार किया जाता है।
हमारा प्रश्न है कि श्लोकों में श्रीकृष्ण की बाल्यावस्था का वर्णन होने पर 'रमु क्रीडायाम्' का अर्थ विषयभोग कैसे होगा? अर्थात् जहाँ बाल्यावस्था का वर्णन हो, वहाँ रमण का अर्थ विषयभोग नहीं होता। यदि विषयभोग अपेक्षित होता, तो 'यम् मैथुने' धातु का प्रयोग होता। अतः ऐसे सभी वर्णनों में प्रकरणानुसार 'रमयन्ति' का अर्थ 'प्रसन्न करना' होगा। अर्थात् बालक कृष्ण नाना प्रकार की उपर्युक्त क्रीड़ाएँ करके गोपियों को प्रसन्न किया करते थे।
धातुपाठ में 'रमु क्रीडायाम्' (भ्वादिगण) का मूल अर्थ क्रीड़ा ही है, तब यहाँ आर्यसमाजियों ने 'विषयभोग' अर्थ ही क्यों ग्रहण किया?
'गोपैः समं रममाणो व्रजे' इसका अर्थ 'गोपबालकों के साथ खेलते हुए' होगा या आर्यसमाजी यहाँ भी विषयभोग ही मानेंगे?
अपनी पुस्तक 'आर्याभिविनय' में स्वामी दयानन्द 'सोम रारन्धि नो ह्वदि' मन्त्र के अर्थ में लिखते हैं, "हे परमात्मा! आप हमारे हृदय में यथावत् रमण कीजिए।" तब हमारा प्रश्न है कि आर्यसमाजी जब इस मन्त्र का उच्चारण करते हैं, तब क्या वे परमात्मा का संभोग हेतु आवाहन कर रहे होते हैं?
इसी प्रकार 'भाष्य-भूमिका' के 'वेदविषय-विचार' में स्वामी दयानन्द 'परमेश्वर एव रथो रमणाधिकरणम्' मन्त्र का अर्थ करते हुए लिखते हैं, "परमेश्वर को सब स्त्री-पुरुषों के रमण का आश्रय कहते हैं।" तब क्या आप यहाँ भी आर्यसमाजियों के ईश्वर को सभी आर्यसमाजी स्त्री-पुरुषों से मैथुन करने वाला मानेंगे?
'सत्यार्थप्रकाश' में भी स्वामी दयानन्द ने अनेक स्थानों पर 'रमण' शब्द का प्रयोग किया है। वहाँ किसी एक स्थान पर भी रमण का अर्थ विषयभोग क्यों नहीं लिया गया?
'सत्यार्थप्रकाश' में ही मनुस्मृति के श्लोक, 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः', का अर्थ करते हुए स्वामी दयानन्द लिखते हैं, "जिस कुल में नारी लोग रमण अर्थात् आनन्द-क्रीड़ा करती हैं।" तब क्या यहाँ भी विवेक एवं सच्चिदानन्द जैसे दयानन्दी रमण का अर्थ संभोग मानते हुए यह कहेंगे कि दयानन्दियों के कुल की महिलाओं का जब सम्मान होता है, तभी देवता उनके घर संभोग करने आते हैं?
अतः भागवत के इस प्रकरण में बाल्यावस्था के परिप्रेक्ष्य में 'रमण' शब्द का अर्थ क्रीड़ा, आनन्द अथवा प्रसन्नता है, मैथुन नहीं। गोपियाँ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण से कहती हैं, "सन्त्यज्य सर्वविषयान् तव..." अर्थात् "हम सभी विषयभोगों को छोड़कर भक्त बनकर तुम्हारी शरण में आई हैं।"
गोकुल में श्रीकृष्ण लगभग दस वर्ष की आयु तक रहे थे। ग्यारहवें वर्ष में वे मथुरा चले गए थे। जिस समय का यह प्रकरण है, उस समय उनकी आयु लगभग नौ वर्ष सिद्ध होती है। अतः जब पुराण यहाँ उनकी बाल्यावस्था का वर्णन कर रहे हैं, तब यह लीला विशुद्ध सिद्ध होती है। केवल 'रमण' शब्द के आधार पर संभोग का वर्णन सिद्ध नहीं होता।
अतः स्पष्ट होता है कि इस श्लोक तथा इस प्रकरण में लौकिक संभोग का न तो वर्णन है और न ही उसका संकेत। यह विशुद्ध प्रेम का वर्णन है। इस विशुद्ध प्रेम का विस्तार भी इस पुस्तक में किया जाएगा, जिससे इस लीला की महत्ता व वास्तविक तात्पर्य ग्रहण कर सकेंगे।
विभिन्न पंथों एवं मत-मतान्तरों द्वारा श्रीकृष्ण एवं श्रीराधाजी के संबंध में लगाए जाने वाले ऐसे विविध आक्षेपों का शास्त्रसम्मत एवं तार्किक उत्तर इस पुस्तक "श्रीकृष्णसुदर्शनम्" में प्रस्तुत किया गया है। इसमें प्रामाणिक शास्त्रीय प्रमाणों के साथ-साथ तर्कपूर्ण विवेचन के माध्यम से इन आक्षेपों का समुचित निराकरण कर दिया गया है।
अतः सनातन धर्म की, भगवान् श्रीकृष्ण की इस महत्त्वपूर्ण सेवा एवं पुनीत कार्य में अपना यथासम्भव सहयोग प्रदान करें और इस ज्ञान-प्रसार के अभियान के सहभागी बनें।